जीवन में क्यों जरूरी है ज्योतिष शास्त्र – श्रीकांत सौरभ

अन्तर्द्वन्द धर्म/अध्यात्म
ज़िंदगी अनमोल और अनंत है। जन्म या मृत्यु इसकी दो अवस्थाएं। यह एक शरीर से दूसरे शरीर तक की यात्रा है। इसी के बारे में भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है। जबकि ज्योतिष शास्त्र के रचयिता भृगुऋषि ने वैज्ञानिक ढंग से सिद्ध भी किया है। उन्होंने पुनर्जन्म के बारे में कहा है, “भाग्यान्ते पुनः भोग्यर्थे अगतो बसुधातल”। यानी शेष बचे हुए कर्मों व उनके फलों को भोगने के लिए मनुष्य पृथ्वी पर दोबारा जन्म लेता है। ये बचे हुए और भविष्य के कर्म क्या हैं? इस सबकी जानकारी ज्योतिष शास्त्र देता है।
इस शास्त्र का मौलिक सिद्धांत है, दुनिया की कोई भी चीज चाहे वो चल (गतिशील) या अचल (स्थायी) है। वो जरूर इस ब्रहांड में अपनी शक्ति के अनुसार दूसरे पदार्थों पर प्रभाव डालती है या दूसरे पदार्थ से प्रभावित होती है। इसलिए ज्योतिषी शास्त्र में “यंत्र पिंडे तंत्र ब्रहांडे” का सिद्धांत स्वीकार किया गया है। मतलब दुनिया की हर चीज पर ब्रहांड का प्रभाव है।
जन्म म साथ ही कोई आदमी उस समय के प्रकृति के गुण-दोष के प्रभाव में आने लगता है। यहीं प्रभाव उसके व्यक्तित्व संबंधी गुण-दोष के रूप में उभरने लगता है। पूरी उम्र आदमी ब्रह्मांडीय अव्यवस्था के प्रभाव को भोगता रहता है। ये अव्यवस्था किसी आदमी के जीवन में एक बीज की तरह होती है जो अपने गुण-दोषों के द्वारा पूरे जीवन को प्रभावित करती है।
लेकिन इस ब्रह्मांडीय सत्य को पूरा सच मान लेना सही नहीं है। इस कारण भ्रम की स्थिति भी उतपन्न हो सकती है। जिन परिणामों की संभावनाएं ये ब्रह्मांडीय स्थितियां प्रस्तुत करती हैं, हर बार वह सच नहीं होती। इन सबके बीच में कोई न कोई दिव्य शक्ति या उसके अस्तित्व की संभावनाएं, इस सृष्टि में जरूर मौजूद है जो फलों को प्रभावित करती है।
ज्योतिषी शास्त्र के मुताबिक जीवन की अनुकूलता व प्रतिकूलता के चरण कारण निम्न प्रकार से हैं जो प्रभाव डालते हैं
1. वंशानुक्रम – एक आदमी के जीवन में सबसे बड़ा प्रभाव वंशानुक्रम का पड़ता है। वह जिस देश, काल, जाति, धर्म, गोत्र परिवार में जन्म लेता है। वहां के नैसर्गिक गुण-दोष उस पर सबसे ज्यादा असर डालते हैं। इसी प्रकार मां-बाप के कुछ नैसर्गिक गुण-दोष उसकी सभी संतान में मौजूद रहते हैं।
2. वतावरण – वतावरण किसी भी जीव के विकास की नींव होती है। इसका प्रभाव वंशानुक्रम से अधिक गहरा होता है। क्योंकि इसी वतावरण से जीव उन अवस्थाओं को प्राप्त कर लेता है जो उसमें जन्मजात नहीं होते। वतावरण के अनुसार ही किसी जीव की सोच, काम की क्षमता, विवेक, मानसिक अवस्था, रहन-सहन और व्यवहार आदि निर्धारित होते हैं। इसमें बदलाव होने पर जीव के व्यवहार में भी परिवर्तन आता है।
3. कर्म – इस दुनिया में ऐसा कोई भी जीव नहीं जो कर्म ना करता हो। यह शारीरिक ही नहीं मानसिक भी होता है। आदमी चाहे शारीरिक रूप से काम करें या मानसिक, दोनों ही काम समझे जाएंगे। इसी लिए गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है, कर्म करते हुए उसके फल के बारे में ना सोचें, ना ही उसकी कामना की जाए। अन्यथा यह कर्म फल को जन्म देता है और बंधन में बांधता है। प्रकृति की विशेषता है ये कि वह खुद को दोहराती है। जाहिर सी बात है कोई सद्कर्म करेगा फल भी वैसा ही मिलेगा। नीति विरुद्ध आचरण का दुःखद फल तो हम सब भुगत ही रहे हैं।
4. काल – काल इस दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है जो लगातार अपने प्रवाह में चलती रहती है। यह परमात्मा के अलावा किसी के वश में नहीं। विभिन्न काल का प्रभाव उस समय की विभिन्न पीढ़ियों पर पड़ता रहा है। चाहे वह इतिहास की कोई कहानी हो, वर्तमान हो या भविष्य की सोच। इसे ही ‘त्रिकाल’ कहा गया है। इसे जानने का एक प्रभावशाली माध्यम ज्योतिष शास्त्र भी है। शायद इसीलिए एक कुशल ज्योतिषी ‘त्रिकालदर्शी’ भी होता है। हालांकि इसके लिए ज्योतिष विद्या के ज्ञान के साथ किसी इष्टदेव की कृपा मिलनी जरूरी शर्त है।
ज्योतिष शास्त्र जीवन क्रम में अनुकूलता व प्रतिकूलता के चार कारणों को मानता है। ये चारों कारण जीवन की गति को संचालित करने में बखूबी भूमिका निभाते हैं। वंशानुक्रम, वातावरण, कर्म और काल।
इसमें काल के दो भाग हैं –
1. अखंड काल (Eternal Time) – इस काल का ना तो आदि है न अंत। इसीलिए इस समष्टिगत काल (Macro Time) कहा जाता। यह अखंड काल सृष्टि (Nature) के निर्माण व विनाश का कारण बनती है।
2. खंड काल (Segment Period) – इस काल को पहचानने के लिए या प्रयोग के लिए कई खंडों में बांटते हैं। यह काल व्यवहारिक तौर पर प्रयोग होता है। इसी कारण ज्योतिष शास्त्र को “कलाश्रित ज्ञानम (Art based knowledge)” भी कहा जाता है।
खंड काल के लिए ज्योतिष शास्त्र में 11 अंग माने गए हैं –
1. वर्ष, 2. अयन, 3. ऋतु, 4. मास, 5. पक्ष, 6. तिथि, 7. वार, 8. नक्षत्र, 9. योग, 10. करण, 11. लग्न
1. वर्ष – समय की गणना का मुख्य आधार वर्ष है। इसका प्रयोग मुंडन, विद्यारंभ, उपनयन, विवाह आदि कार्यों के मुहूर्त देखने के लिए किया जाता है। वर्ष भी तीन प्रकार के होते हैं।
(क) सौर वर्ष – सूर्य का मेष राशि में प्रवेश से लेकर मीन राशि के अंत तक का समय सौर वर्ष कहलाता है। जब भी सूर्य चित्रा नक्षत्र के विपरीत में होता है तो उसे मेष राशि का प्रथम बिंदु माना जाता है। दोबारा जब उसी बिंदु पर लौटता है तब तक का समय एक सौर वर्ष कहलाता है। सामान्य तौर पर ज्यादातर सूर्य मेष सक्रांति 14 अप्रैल को होती है। जब कभी सूर्य किसी राशि को पूरा कर अगली राशि में प्रवेश करता है, उसे उस राशि का संक्रांति कहा जाता है।
बता दें कि सूर्य की दैनिक गति 1° प्रतिदिन है। इस प्रकार वह 360° का भचक्र लगभग 365 दिन 6 घण्टे 9 मिनट में पूरा करता है।
(ख) चन्द्र वर्ष – चन्द्र वर्ष की शुरुआत शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा (एकम) को होती है। एक चन्द्र मास की अवधि शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक 30 तिथियों की होती है। यह लगभग 29.53 दिनों की होती है। इस प्रकार कुल 12 चन्द्रमासों का एक चन्द्र वर्ष होता है। इसकी कुल अवधि 29.53*12 = 354.36 दिन होती है।
चन्द्र मास का नामकरण उस महीने में पूर्णिमा को पड़ने वाले नक्षत्र के हिसाब से रखे गए हैं।
इसमें पहला, चैत्र – नक्षत्र चित्रा, दूसरा, वैशाख – नक्षत्र विशाखा, तीसरा, ज्येष्ठ – नक्षत्र ज्येष्ठा, छठा, आषाढ़ – नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा, सातवां, सावन – नक्षत्र श्रावण, आठवां, भादो – नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद, नौवां, अश्विन – नक्षत्र अश्विनी, दसवां, मार्गशीष (अगहन)- नक्षत्र मृगशिरा, दसवां, पौष – नक्षत्र पुष्य, ग्यारहवां, माघ – नक्षत्र मघा, बारहवां, फाल्गुन – नक्षत्र फाल्गुनी
(ग) ब्रह्मसपत्य वर्ष – ब्रह्मास्पत्य वर्ष को ‘संवत्सर’ भी कहा जाता है। यानी इस अवधि में गुरु अपनी मध्यम गति से एक राशि का विहार करते हैं। इसे जोवियन वर्ष (Joviyan Year) भी कहते हैं। कुल संवत्सर 60 हैं जो खुद को दोहराते रहते हैं। अतः जब भचक्र के गुरु (12 राशि * 5 भ्रमण = 60 संवत्सर) यानी 5 बार भ्रमण करते हैं। तब यह संवत्सर खुद के नामानुसार जीवों पर प्रभाव डालते हैं। 60 संवत्सर के बाद दुबारा यह भ्रमण 1 से शुरू करते हैं।
कुल 60 संवत्सर नीचे चार्ट में हैं। क्रमश:
*श्रीकांत सौरभ
(*सरल, सहज और रोचक ज्योतिष आलेख श्रृंखला के तहत हम रोज एक नया पोस्ट करेंगे। भले ही कंटेंट पुराना हो लेकिन प्रस्तुति नई होगी। ज्योतिष विद्या के नए साधकों को इससे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।)