हमारे पास प्रोमोशन के लिए पैसा नहीं है

Entertainment
कुछ लोगों का तर्क है कि अब बिहार में लोग सिनेमा देखने थियेटर में नहीं जा रहे हैं । उनके चक्षुओं को सांत्वना देने के लिए मैं यहां ग़दर 2 और जवान दोनों फिल्मों का कलेक्शन रिपोर्ट टैरिटरी के हिंसाब से लगा रहा हूँ । दोनों ही हालिया रिलीज़ फिल्में हैं और दोनों में से किसी की मेकिंग मे भी बिहार उत्तरप्रदेश का कोई विशेष योगदान नहीं है । लेकिन इन दोनों फिल्मों ने बिहार,झारखण्ड , उत्तरप्रदेश में कितना व्यवसाय किया हुआ हैं यह आप ख़ुद ही देखिए ।
और फिर आप अपनेआप में यह गणना कीजिये कि क्या वाकई बिहार उत्तरप्रदेश में जनता थियेटर में नहीं जा रही !? या फिर हम उन्हें बुलाने में ही असमर्थ हैं ,! ग़दर 2 ने बिहार झारखण्ड से 22.32 करोड़ तो उत्तरप्रदेश से लगभग 100 करोड़ का व्यवसाय किया है । वहीं जवान ने बिहार झारखण्ड से 9.54 करोड़ तो उत्तरप्रदेश से लगभग 60 करोड़ का व्यवसाय किया है । ये कलेक्शन इतना ज्यादा है कि इसमें भोजपुरी की कई बड़ी फिल्में बन जाएं ।
भोजपुरी सिनेमा के गढ़ में हिंदी सिनेमा का वर्चश्व कब टूटेगा ? शायद कभी नहीं , क्योंकि हम सिनेमा नहीं बना रहे बल्कि उस सिनेमा की आड़ में बस अपने घर की दाल रोटी चला रहे हैं और सिनेमा पर खर्च होने वाला पैसा सुपरस्टारों की जेबें गरम करने में उड़ा दे रहे हैं । फिर हम रोना धोना शुरू कर देते हैं की हमारे फ़िल्म का बजट इतना बढ़ गया, हमारे पास प्रोमोशन के लिए पैसा नहीं है । दरअसल यहां मैनेजमेंट पर खर्च करने के लिए ही पैसा नहीं है, डायरेक्टर को देने के लिए ही पैसा नहीं है, राइटर को देने के लिए पैसा नहीं है, पीआरओ को देने के लिए पैसा नहीं है, बाकी सुपरस्टार को देने के लिए पैसे के साथ सबकुछ है । और यही बात हिंदी फिल्मों में नहीं है । वहाँ सुपरस्टार को देने के लिए बजट है तो उसका दुगना मेकिंग पर खर्च करने के लिए भी पैसा है और कुल बजट का 20-25% पीआर पर खर्च करने के लिए भी बजट है । आप टाइपकास्ट होकर केवल फिल्में बनाएंगे और कुछ नयापन नहीं लाएंगे, 25-30 लाख में फिल्में बनाएंगे, कैम्पिंग करके हीरो – हीरोइन रखेंगे और चाहेंगे कि इन्हीं को देखने के लिए थियेटर में बिहार-उत्तरप्रदेश की प्रबुद्ध जनता जाए !? ये किस सीने-मेकर्स ने आपको इस प्रकार करने की सद्बुद्धि दे दी । अब यदि मेरी बात कड़वी लग रही होगी तो लगे , हम क्या कर सकते हैं ? हमने सच बोला है कि आज भी उन्हीं थियेटरों में जनता जा रही है फिल्में देखने , बस आप उस स्तर की फिल्में बनाइये, उस स्तर के पीआर कीजिए, उस स्तर की कहानी, पर खर्च कीजिये । वरना भोजपुरी सिनेमा तो डिजिटल तक सिमट ही गई है , अब यहाँ से भी पतन होने में देर नहीं लगेगी ।
सादर धन्यवाद – अभिषेक तिवारी