वर्ष की गणना हमारे यहां तीन तरह से की जाती है जो निम्न हैं-

अन्तर्द्वन्द धर्म/अध्यात्म

1. ईस्वी सन – आज दुनिया भर में अधिकांश जगहों पर इसी कैलेंडर वर्ष का प्रचलन है। यह अंग्रेजी वर्ष है जिसे सन के नाम से बुलाया जाता है। जैसे सन 2023।
2. विक्रमी संवत – यह संवत कलियुग के लगभग तीन हजार वर्ष बीतने के बाद चलन में आया। उज्जैन में विक्रमादित्य नाम के प्रतापी शासक ने विदेशी शकों को हराकर विजय के उपलक्ष्य में विक्रमी संवत चलाया था। यह ईशा (Chriest) के जन्म के 57 वर्ष पहले चलाया गया। इसलिए ईस्वी सन में 57 जोड़ने पर, उदाहरण के लिए 2023 + 57 = 2080 विक्रमी संवत आता है।

3. शक संवत – यह संवत विक्रमादित्य के 135 वर्ष व ईशा के 78 वर्ष बाद प्रचलित हुआ। भारत में शालिवाहन नामक राजा हुए। उन्होंने ही इसकी स्थापना की। इसे आम भाषा में ‘शाक’ या ‘शाके’ कहा जाता है। भारत सरकार ने इसे ही राष्ट्रीय तिथि पत्रक में मान्यता दी है।

इस तरह से ईस्वी सन में 78 और विक्रमी संवत में 135 घटाने पर शक संवत का पता लगा सकते हैं।
सन 2023 – 78 = 1945 शक संवत
विक्रमी संवत 2080 – 135 = 1945 शक संवत
ध्यान दें, इन तीनों में विक्रमी संवत चन्द्र वर्ष पर व शक संवत व ईस्वी सौर वर्ष पर आधारित है।
अयन – एक सौर वर्ष में दो अयन होते हैं-
(क.) उत्तरायण और (ख.) दक्षिणायन
जब भी सूर्य भचक्र से भ्रमण करते हुए कर्क राशि में (कर्क संक्रांति) प्रवेश करता है तब दक्षिणायण शुरू होता है। ये धनु राशि के बीतने तक दक्षिणायन रहता है। धनु राशि से जैसे ही मकर राशि (मकर संक्रांति) में प्रवेश करता है, उसे उत्तरायण माना जाता है। साथ ही मिथुन राशि के बीतने तक उत्तरायण ही रहता है।

इस तरह से सूर्य के अलग-अलग छह-छह राशियों में भचक्र भ्रमण को उत्तरायण व दक्षिणायन कहा गया है। बता दें कि दक्षिणायन को ‘देवताओं की रात्रि’ और उत्तरायण को ‘देवताओं का दिन’ कहा गया है।

इसीलिए आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (एकम) को ‘देवशयनी एकादशी’ के रूप में जाना जाता है। जब भगवान विष्णु आराम की मुद्रा में चले जाते हैं। यह क्रम कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (एकम) ‘हरिबोधिनी एकादशी’ तक चलता है। गौरतलब है कि इस अवधि में हिन्दू समाज बहुत से शुभ आयोजन नहीं करते, जैसे विवाह संस्कार आदि। हरिबोधिनी एकादशी को देवउठावनी एकादशी भी कहा जाता है, इसमें सभी शुभ कार्य शुरू किए जाते हैं।
सभी सौर वर्ष में कुल छह ऋतुएं होती हैं। इन ऋतुओं का निर्धारण सूर्य के विभिन्न राशियों में भ्रमण करने पर होता हैं। नीचे चार्ट देखिए-

*श्रीकांत सौरभ

(*सरल, सहज और रोचक ज्योतिष आलेख श्रृंखला के तहत हम रोज एक नया पोस्ट करेंगे। भले ही कंटेंट पुराना हो लेकिन प्रस्तुति नई होगी। उम्मीद है, ज्योतिष विद्या के नए साधकों को इससे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।)