रवि किशन को बहुत कुश्ती लड़नी पड़ी, वक्त से, हालात से, और अपने गलत चुनावों से।

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कुछ दिन पहले रिलीज हुई नेटफ्लिक्स की मामला लीगल है का किरदार बीडी त्यागी, किसी भी एक्टर के लिए सपने की तरह है। इस किरदार में इतने शेड है, इतने उतार चढ़ाव है,इतनी गहराई है कि एक्टर ऐसे रोल के लिए एक दूसरे से कुश्ती करने में भी ऐतराज नहीं करेंगे। पर इस रोल तक आने के लिए रवि किशन को बहुत कुश्ती लड़नी पड़ी, वक्त से, हालात से, और अपने गलत चुनावों से।
करीब 32 साल पहले रवि किशन के पिताजी अपने बेटे की हरकतों से तंग आ चुके थे, गुरबत में भी एक इज्जतदार जिंदगी जीने वाले शुक्ला जी को बिलकुल पसंद नहीं था कि उनका लड़का ढोल की आवाज सुनते ही घर से बाहर निकल कर नाचने लगे। किसकी शादी किसकी बरात, किसकी मय्यत, किसकी रैली है, रवि किशन को बस ढोल सुनाई देता था, जैसे उन्ही के नाचने के लिए नियति और प्रकृति ने मिलकर ढोल का इंतजाम किया है। एक कलाकार था अंदर, जो नही जानता था कि इस एनर्जी का सही इस्तेमाल कैसे करे। फिर एक मौका मिला, रामलीला में सीता बनने का। पिता जी को पसंद नही था, रवि किशन पिताजी से छुपकर रोल करने लगे, सोचा कि बाद में देखा जाएगा। पर दिक्कत ये थी कि पहले पिता जी ने देख लिया। बहुत मारे, मारते मारते घर लेकर आए, उस दिन रवि के पिताजी रवि को इतना मारना चाहते थे कि गांव वालो के सामने मिसाल बन जाए। मां को डर लगा, रवि को बुलाया, उसे पांच सौ रुपए देकर कहा कि यहां से भाग जाओ वरना जान नही बचेगी।
रवि को नही पता था, कि उस वक्त वो पिता से बचने के लिए भागे थे, या स्टार बनने के लिए, पर पिता से कोई शिकायत नहीं थी, मन में प्यार था सम्मान था, और रवि किशन पहुंचे मुंबई। वो मुंबई, जहा के स्टेशन पर रोज एक सपना उतरता है, और अगले हफ्ते खाली पेट दम तोड़ देता है। रवि किशन पहुंचे तो किसी तरह से छत और रोटी के जुगाड़ में लग गए। इस दौरान जो भी काम मिला करते रहे, सपना था अमिताभ बनने का मिथुन बनने का, पर काम में छोटा बड़ा नही देखा। इसके फायदे भी हुए और नुकसान भी, फायदा ये कि हुनर तराशा जा रहा था, नुकसान ये की हुनर दिखाने का मौका नही मिल रहा था। कही एडिटिंग टेबल पर झूल जाए तो कभी बीच शूटिंग में पता चले की अब वो हिस्सा नहीं है वो फिल्म का।
पर गांव दिहात के आदमी के साथ दिक्कत ये होती है कि वो खेती के लिए बारिश का इंतजार तो करता है, दुआए भी करता है, पर उसकी खेती मौसम या प्रकृति की मोहताज नहीं होती, भगवान साथ दे दे तो अच्छा, नही देंगे तो इतनी ताकत है कि प्रकृति के स्वभाव के विपरीत जाकर फसल उगाकर दिखा दे।
रवि किशन मुंबई आए थे तो भाषा, से लेकर हर चीज पर उन्हे काम करना था। किया उन्होंने, ऐसी फिल्मों के लिए भी दिन रात मेहनत रिहर्सल करते रहे, जिनके बारे में उन्हे अच्छे से पता था कि रोल कट जायेगा। बीच बीच में कुछ फिल्मों के जरिए लोगो की निगाह में चढ़े पर इतने के लिए तो घर से भागे नही थे। फिर डीडी मेट्रो पर एक सीरियल मिला, हैलो इंस्पेक्टर, इस सीरियल की मदद से रवि किशन पहले लोगो के घर में घुसे फिर दिल में। इतना तो साबित कर दिया था कि ये एक्टर किसी भी तरह का रोल कर सकता है, पर इस एक्टर को रोल देना दर्शको के जिम्मे था नही।
फिर 2003 में रिलीज हुई तेरे नाम,ओरिजिनल और सही आंच पर भुना गया कबीर सिंह। रवि किशन को उस रोल के लिए कई अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया गया था। उसी दौरान भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री फिर से पनपना शुरू हो रही थी। भोजपुरी फिल्मों ने रवि किशन को स्टार का दर्जा दिया। उसी दौरान बिग बॉस वालो की तरफ से ऑफर आया, बिग बॉस में ज्यादातर टूटेले फटेले आइटम आते थे उस वक्त, पर रवि के पास काम था पहले से, शायद उसी काम के बोझ से भागने के लिए रवि ने बिग बॉस का ऑफर ले लिया। वहा पर उनकी बोली भाषा, और अंदाज ने उन्हे गांव शहर के हर घर का हिस्सा बना दिया। अब लोग रवि किशन को पहचानते थे, जानते थे, उनसे जिंदगी झंड बा डायलॉग बोलने के लिए जिद करते। पर बात फिर भी वही घूम फिर कर आ गई थी कि स्टारडम तो चाहिए था पर काम की वजह से,किरदार की वजह से, ऐसे किरदार जो लोगो को ये भूलने पर मजबूर कर दे कि यही रवि किशन है।
बिग बॉस से फायदा ये हुआ कि लोगो की नजर पड़ी, और छोटे लेकिन अहम किरदार मिलने लगे। रवि ने अपनी मेहनत से उस किरदार को बड़ा किया, श्याम बेनेगल, मणिरत्नम जैसे डायरेक्टर की फिल्मों का हिस्सा बने। फिर हेरा फेरी में तोतला सेठ के बेटे के किरदार के डायलॉग , “क्या खुसुल फुसुल” “बीस लात दे” ने इंटरनेट का चहेता बना दिया। फिर यू हुआ कि रवि किशन रिलवेंट हो गए, मतलब सब जानते थे, सबको पता था कि रवि किशन कौन है, कोई सोलो हिट तो नही थी, पर ज्यादातर हिट फिल्मों के फैन रवि के निभाए किरदार गुनगुनाने लगे थे। फिर साउथ में एंट्री हुई, वहा और अच्छे रोल मिले, ज्यादा एक्सपोजर मिला, और उसी दौरान राजनीति में कदम रख दिया, पहला चुनाव अपने घर में बुरी तरह हारे। रवि अब तक हर तरह के रोल कर चुके थे, पर नाम उतना नही बन पा रहा था जितनी मेहनत लग रही थी। ये कुछ ऐसा था कि जिस फिल्म में रवि किशन पचासा मारे, उस फिल्म में किसी और के शतक की चर्चा ज्यादा होने लगे। रवि को शिकायत नही थी क्युकी यही ढंग है सिनेमा का, रवि को बस उम्मीद थी कि एक मौका तो आयेगा कभी न कभी जब पावर प्ले भी हम खेलेंगे और स्लॉग ओवर में भी।
फिर राजनीति की दूसरी पारी शुरू हुई, चुनाव जीता सांसद बने। अब पैसा, फेम और पावर तीनों था साथ में। लोगो को लगा कि अब रवि किशन नेता बन गए है, अब सिनेमा छोड़ देंगे, कुछ को लगा कि एक नेता के लिए अभिनय को मैनेज करना मुश्किल होगा। पर जिस लड़के ने पिताजी की मार के बाद भी एक्टिंग नही छोड़ी, नाचना नही छोड़ा, वो किसी और चीज के डर या लालच से क्या ही एक्टिंग छोड़ता। हा बस अब की बार फर्क ये था रवि को समझ आया कि वो चुन सकते है, अब वो ऐसे रोल कर सकते है जो सिनेमा के उनके तीस साल के अनुभव के साथ न्याय कर सके। रवि ने फिर से सर्वाइवल का खेल चालू रखा, खामोशी से छोटे छोटे किरदार करते रहे, साल की किसी न किसी बड़ी फिल्म में वो दिख ही जाते।
फिर आया साल 2024 नेता रवि किशन का नही, अभिनेता रवि किशन का साल। लोअर ऑर्डर में कम गेंद और मुश्किल सिचुएशन में खेलने वाले लड़के को एक डायरेक्टर ने ओपनिंग थमा दी। मतलब तब तक खेलना है, जब तक ओवर न खत्म हो जाए, आउट तो वो किसी रोल में हुए नही थे आज तक। फिल्म की शुरुआत से आखिर तक, सिर्फ और सिर्फ बीडी त्यागी। ऐसा किरदार, जो एक महत्वाकांक्षी इंसान है, पर अपनी महत्वाकांक्षाओं की दौड़ में भी वो इंसान बना हुआ है। उसके तरीके उसके इरादे को लेकर दर्शक श्योर नही है,पर उन्हे ये किरदार सही लग रहा है। पूरी सीरीज में रवि किशन बैटिंग करते रहे, एक प्रेसिडेंट, वकील, बॉस, बेटे, बाप, इस किरदार में जो जो मौका मिला रवि किशन हर मौके को बचपन में बजने वाले ढोल की आवाज समझकर खुलकर नाचते रहे।
फिर दूसरी फिल्म आई लापता लेडिस,मालूम चला कि रवि किशन ने ऑडिशन के जरिए इस फिल्म में आमिर खान को रिप्लेस किया। फिल्म रिलीज हुई, फिल्म की तारीफ हुई और रवि किशन की भी। साल भर मीडिया और लोगो के बीच में गंभीर चेहरे के साथ नजर आने वाले रवि किशन, जो इस वक्त यूपी के सबसे ताकतवर राजनैतिक नामो में गिने जाते है, वो अपनी खुशी नही छिपा पा रहा है अपने चेहरे से, ऐसा जैसे किसी बच्चे ने सालो पहले कोई खिलौना देखा था, और लंबे इंतजार के बाद उसने अपनी मेहनत से वो खिलौना हासिल कर लिया। रवि किशन को देखकर ये बात आप समझ सकते है कि एक कलाकार, अपनी जिंदगी में कुछ भी बन जाए, कुछ भी हासिल कर ले, उसे भूख सिर्फ कला की रहती है, वो व्हीलचेयर पर एक्टिंग करेगा, दवाओ के सहारे एक्शन सीन करेगा, पर उसे करने दो, उसे किरदार निभाने दो, उसे लोगो को एंटरटेन करने दो, क्युकी रवि किशन 32 साल पहले अपने घर से न तो संसद बनने के लिए भागे थे, ना ही स्टार, वो बस ऐसे किरदार निभाने निकले थे, जिनके लिए उन्हें याद रखा जाए, ऐसे किरदार जो उसके जाने के बाद भी लोगो को गुदगुदाते रहे, रुलाते रहे, याद आते रहे।ऐसे बहुत से एक्टर है इंडस्ट्री के जिन्हे दशक बीत गए, जिन्होंने कुछ गलत नही किया है अपने करियर में,सब जानते भी है, बस उनका वक्त नहीं आया है, उनकी झोली में अभी बीडी त्यागी जैसा किरदार नही आया है, जो जितना बेहतरीन हो उतना मशहूर भी हो जाए, पर वो डिजर्व करते है, आज नही कल, रवि किशन को तरह उन्हे भी एक मौका मिलेगा पावर प्ले में खेलने का, तब तक विकेट बचाए रखो, टुक टूक करते रहो, जब चांस मिलेगा तब डाउन द ग्राउंड खेलेंगे।