आसान नहीं होता किसी का कृष्ण बनना – श्रुति शुक्ला

अन्तर्द्वन्द धर्म/अध्यात्म

आसान नहीं होता किसी का कृष्ण बनना, ना ही आसान होता है बनना कृष्ण का अर्जुन। निस्वार्थ त्याग, सत्य और विश्वास में बंधना पड़ता है। कृष्ण ईश्वर इसलिए ही कहलाए क्योंकि उनमें कभी ईश्वर बनने की चाह नहीं थी। उन्होंने ख़ुद को अर्जुन में देखा और अर्जुन में ख़ुद के दर्शन करवाए। अर्जुन कृष्ण के हो पाए क्योंकि रिश्ते में सम्मान, मार्गदर्शन और पारदर्शिता थी। मित्रता हो या प्रेम क़िरदार छुपा तक लंबे वक्त तक निभाया नहीं जा सकता और किसी को धोखे में रखना स्वयं से धोखा करना है। एक दूसरे को ख़ुद को सौंपने से और उनकी भावनाओं को अपनाने से, सम्मान करने से मिलती है भावनात्मक आज़ादी। अर्जुन कृष्ण के और कृष्ण अर्जुन के रहे क्योंकि उन्होंने कभी एक दूसरे को ख़ुद से अलग नहीं देखा, कठिन से कठिन परिस्थिति में भी उनसे छल या उन्हें जाने नहीं दिया। कृष्ण ने कर्म लेख बताया तो अर्जुन ने उसके अनुसार अपना कर्म लिखा।

जीवन किसी संग्रहालय से कम नहीं, जिसमें खट्टी मीठी यादें, बिखरी बातें, सिमटे जज़्बात और न जाने कितने सपने उपस्थित हैं। कुछ लोग जिन्हें हम जाने नहीं देना चाहते, वो लोग भी जिन्होंने हमें जाने दिया, वो लोग जो बिछड़ कर भी साथ रहे, वो लोग जो साथ रह कर भी बिछड़ गए, वो लोग जो आने वाले कल में आने वाले हैं, वो लोग जो बीते हुए पल में बीत नहीं पा रहे। ऐसी तमाम चीज़ों का घर है ज़िंदगी।

पर याद रहे इस घर को संजोना, इसमें कोई सपना पालना, इसमें किसको जगह देना ये आपकी ज़िम्मेदारी है। लोग ऐसे रखें जहां आप स्वीकार किए जाएं, जिन्हें आपकी पड़ी हो, जहां भावनाओं की कद्र हो, ख़्वाब ऐसे देखें जो आपकी उड़ान बनें।

सपने देखना, उनका सफल या असफल होना, सपने टूटना ज़िंदगी की प्रक्रिया मात्र हैं, पर सब कुछ हार कर भी कौन आपको जीतना चाहता है ऐसा कृष्ण या ऐसा अर्जुन ज़रूर रखें। अपना कृष्ण या अपना अर्जुन ऐसा चुनें जो रणभूमि में आपका हाथ थाम , आपका सारथी बन बिना किसी की परवाह किए आपकी हार को जीत में परिवर्तित कर दे और आपको कभी दूर न जाने दे।

–आसान कहां होता है किसी का कृष्ण बनना, ना ही आसान होता है रह पाना अपने कृष्ण का अर्जुन।

 

– श्रुति शुक्ला