यदि अवैध संबंध अभिशाप है तो इससे निपटे कैसे? श्रीकांत सौरभ

अन्तर्द्वन्द धर्म/अध्यात्म

ये विषय आज भी हमारे भारतीय समाज के लिए ‘टैबू’ ही है। लेकिन कड़वी सच्चाई ये है एक 14 वर्ष से लेकर 75 वर्ष का वृद्ध तक चरित्रहीनता से पीड़ित हो सकता है। लेकिन ऐसा क्यों और किसलिए होता है? हिन्दू शास्त्रों के मुताबिक मनुष्य दुनिया में कर्मों का फल भुगतने के लिए आता है। अस्तित्व में आने के बाद एक इंसान जो कुछ भी भोगता है, उसके साथ जो कुछ भी घटित होता है। वो पूर्व जन्मों के 80 प्रतिशत व इस जन्म के 20 प्रतिशत कर्मों का फल होता है। दरअसल कोई भी जीव अस्तित्व में तभी आता है जब नर-मादा का संगम होता है।

बता दूं कि यहां हमारे लिए जीव के केंद्र बिंदु में मनुष्य है। ज्योतिषी शास्त्र के मुताबिक कोई बच्चा जन्म के पहले छह वर्षों तक मां और अगले छह वर्षों तो पिता के प्रारब्ध से प्रभावित होता है। इसीलिए जब जातक 12 वर्ष की उम्र पूरी कर लेता है। इस अवधि के बीतने के बाद से जातक की कुंडली में बैठे ग्रह अपना असर दिखाने लगते हैं। उसका भाग्य सक्रिय हो जाता है। यहीं उम्र है जब वो किशोर हों या किशोरी उनका स्वाभाविक आकर्षण विपरीत लिंग की बढ़ने लगता है। इस आकर्षण का अंत कहां जाकर होता है, ये बताने की जरूरत नहीं।

लेकिन यहां नैतिकता/अनैतकिता, मर्यादा, संस्कार की बात हटा दें। तो प्रश्न जरूर उठता है कि पुरूष किसी महिला में या कोई पुरुष किसी महिला में खोजता क्या हैं? जवाब देने के लिए बहुत आसान है, किशोर है तो इसे उम्र का नादानीपन या बिगड़ैल, विवाहित है तो छिनाल, चरित्रहीन और बुजुर्ग है तो ठरकी जैसी तमाम उपमा से संबोधित कर देना। लेकिन इस प्रश्न का आध्यात्मिक स्तर पर उत्तर जानने के लिए हमें इसके मूल में लौटना होगा। मनुष्य रूपी जीव तभी अस्तित्व में आता है माता के अंडाणु (Egg) व पिता के शुक्राणु (Sperm) यानी दो अगुणित कोशिकाएं का मिलन होती है। एक बूंद एग व स्पर्म में कई लाख अंश होते हैं। जबकि इसमें एक अंश ही निषेचन के लिए पर्याप्त होता है।

जरा सोचिए, लाखों अंशों को हराते हुए कोई एक अंश अस्तित्व बनाने में सफल हो पाता है। एक शिशु जन्म के 12 वर्षों के बाद जब टीन एज में पहुंचता है। ये वो समय होता है जब उसके सभी इंद्रियों को सक्रिय हो जाते हैं। मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन, डोपामाइन, सेरेटोनिन जैसे हार्मोन का बहाव तेज हो जाता है। और इसके प्रभाव में आकर एक मनुष्य वो सब कुछ जानना चाहता है जो अब तक उसके लिए रहस्य था। अब वो बंदे किशोरी हों या किशोरी, उसका जन्म ही दो अगुणित कोशिकाओं (Haploids) के मिलने से हुआ है। इसलिए वे ऊर्जा का संचार शरीर में महसूस करते ही एकाकार होकर उस पल को जीना चाहते हैं। उस पल को महसूसने के लिए वापस लौटना चाहते हैं। जब वे अस्तित्व में आए थे।

इसी कारण किसी भी युवक या युवती का सबसे पहले एक-दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ता है। जैसा कि मैंने पहले ही बताया था कि कोई भी मनुष्य पूर्व जन्म का 80 प्रतिशत कर्म फल लेकर ही जन्म लेता है। बाकी 20 प्रतिशत इस जन्म का कर्म फल है। अब पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार जिनके कर्म फल सही है। ग्रहों की स्थिति अनुकूल है तो वैसे बच्चे अपनी ऊर्जा का प्रयोग दूसरी जगह यानी विद्या, कला अर्जन आदि सकारात्मक कामों में लगाते हैं। जिन बच्चों के ग्रह पाप प्रभाव में है, और उसी पापी, कठोर, क्रूर या पीड़ित ग्रह की दशा चल रही हो तो ऐसी स्थिति में बच्चे बहक जाते हैं।

भले ही ऐसा होना नैसर्गिक है लेकिन बच्चे नादानी में वैसा कदम उठा लेते हैं। जिसे हमारा समाज मंजूर नहीं करता। पाप समझता है। अक्सर लोक-लिहाज से जोड़ों की हत्या तक कर दी जाती है। ये तो टीनएजर्स की बात हो रहे हैं। इन्हीं ग्रहों की चपेट में आकर पूर्व जन्म का कर्म जब फलित होता है, तो विवाहित, अधेड़ और बूढ़े भी शर्म, लोक-लिहाज को किनारा कर देते हैं। और ‘स्कैंडल’ में फंसकर लोक निंदा का भागी बनते हैं। विवाहेत्तर संबंधों का सबसे का कारण है, वैध या अवैध संबंध बनाते सभी कोई हैं, लेकिन बेहोशी में, अज्ञानता में, असक्तिवश। इस कारण तृप्ति नहीं मिल पाती। और कुछ नयापन की तलाश में बेचारे लोग यहां-वहां भटकते रहते हैं।

जबकि चीजें कहीं बाहर नहीं अपने अंदर हैं। लेकिन ऊर्जा प्रबंधन का समुचित ज्ञान नहीं होना ही सभी समस्याओं का जड़ है। ऐसे में कोई भी पूछ सकता है कि इसका उपाय क्या है? तो ये जान लीजिए हर ऊर्जा की तरह ‘यौन ऊर्जा’ को भी नष्ट नहीं किया जा सकता। इसका प्रबंधन जरूर किया जा सकता है। इसके भी दो रास्ते हैं। पहला है ऊर्जा को ध्यान, योगासन के बल या किसी इष्ट या गुरु के सान्निध्य में भक्ति मार्ग से साधना कर संरक्षित कर लिया जाए। संरक्षित करते हुए ‘ऊर्ध्वरेता’ बन जाएं। अब इसे ऊर्ध्वरेता कहें, अलैकिक सिद्धि, कुंडलिनी जागरण या स्थिर प्रज्ञ, इन शब्दों की चर्चा अक्सर होती रहती है।

उम्र की एक अवस्था में इस स्थिति में पहुंचने के लिए प्रयोग भी ना जाने कितने लोग करते हैं। लेकिन ये मिलता कितनों को है? लाखों-करोड़ों में शायद किसी एक को। क्योंकि इस रास्ते चलते हुए सही गुरु ना मिलने पर अधिकांश जने बीच में ही भटककर मानसिक असंतुलन का शिकार हो बैठते हैं। जबकि अन्य के लिए ये लुभावने, मनमहोक, भारी भरकम शब्द महज चर्चा के लिए वैचारिक विलासिता भर रह जाते हैं।

दूसरा रास्ता है, ऊर्जा को बाहर निकाल ‘अधोगामी’ बन जाएं। ये बहुत ही सरल, सहज और रोचक क्रिया है। इस पर सबसे ज्यादा किसी ने शोध किया, चेतना के स्तर पर चीजों को महसूस कर सिद्धान्त के रूप में स्थापित किया। वे ओशो थे। उन्होंने संभोग से समाधि की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त किया। लेकिन इसके लिए सहभागियों (Partners) का मानसिक, वैचारिक व चेतना के स्तर पर समान होना अनिवार्य है। तभी काम ध्यान बन पाएगा। और इस प्रयोग को आजमाते हुए एक क्षण ऐसा आएगा जब मनुष्य इस रहस्य का जान लेगा। इससे मुक्त हो जाएगा।
इसे ठीक हम उस अंतरिक्ष यान की तरह समझ सकते हैं। जिसे एक खास गति से उड़ाया जाए तो वह अंतरिक्ष मंडल में प्रवेश कर मुक्त हो जाता है। वहां जाकर गुरुत्वाकर्षण के नियमों के मुताबिक भारहीन होकर तैरने लगता है। लेकिन उड़ान भरते समय यदि यान की पूरी गति नहीं मिले तो वह नीचे ही रह जाता है। परिश्रम व्यर्थ जाता है। अध्यात्म के उच्च स्तर पर पहुंचने की नीयत से पार्टनर्स के लिए भी संबंध बनाते समय बस ऐसी ही स्थिति की जरूरत होती है। ताकि यौन ऊर्जा के सही प्रबंधन से शरीर, मन व चेतना सभी एकाकार हो जाएं। अन्यथा की स्थिति में कामनाओं के वश में आदमी का भटकना और बार-बार भोग के जाल में फंसना ही नियति बन जाती है।